Do we need to regulate social media

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टेक सलूशन के बाबजूद भी पुलिस पब्लिक में शामिल हो रही है ताकि वे झूठे-खबरों की इस लड़ाई में अपनी जीत हासिल कर सके।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इस बात पर जोर दिया की “राज्य का काम है की वो उन लोगो को ढूंढे जो वेब और इंटरनेट के जरिये झूठे और अक्रमक अफ़वाए फैलते है”और”लोगो के ऑनलाइन प्राइवेसी का अधिकार “के बीच नियत्रण स्थापित हो सके। आज के वर्तमान में अधिनियम और इंटरनेट प्लेटफार्म के इस तरीके के नियमो को बराबर नियंत्रण स्थापित करता है?
QUESTION- हाल ही के कुछ सालो में मैसेज एप्प जैसे व्हाट्स-एप्प का उपयोग काफी उच्च स्तर पर हो रहा है। समन्वित रूप से फैक न्यूज़ और अफवाह बिना किसी वैधता के,इसके नंबरो में बृद्धि होती जा रही है। क्या व्हाट्स-एप्प के द्वारा उठाय कदम काफी है या इसके बारे में अभी और भी काम करने बाकी है?
जब आप यह पूछते है की क्या कदम उठाने चाहिए,इसके अलावा यह भी पूछना संभव हो जाता है की ये कदम हमे पहले ही उठा लेना चाहिए था. मेरे मानना है की और सब इस बात से सहमत होंगे की इस समस्या का अपने आप कुछ नहीं किया जा सकता है। और इसे टेक्निकल समाधानो से भी नहीं ठीक किया जा सकता है। फेक न्यूज़ इस डिजिटल दुनिया में कोई मुख्य स्रोत से अकेले नहीं आते और यह काफी सालो से खड़ी समस्या भी है। इस क्षेत्र में हमारे पास काफी कम ही सफलता है जहाँ हम कोशिश करते है की लोग इस पर भरोसा न करे। और हम इस बात पर पूरा विश्वास नहीं कर सकते की टेक्नोलॉजी से इसका समाधान हो पाएगा। व्हाट्स-एप्प ने टेक्नोलॉजी के जरिये मेसेज के फोरवोर्ड को 5 लोगो तक भेजने की लिमिट भी लगा दी और यह मानक पहले टेस्ट भी हो चूका है और इसका संचालन दूसरे देशो में भी हो चूका है। व्हाट्स-एप्प इंडिया में तेज़ी से बढ़ता एक मार्किट ही नहीं है बालकी यह एक ऐसा जगह भी है जहाँ समाधान का संचालन भी होता है और दूसरे उभरते मार्किट में भी इसका टेस्ट हो रहा है। अगर हम विकासशील देश में कोई असुविधाजनक स्तिथि ले,फेसबुक और ट्विटर निष्पक्ष रूप से स्वीकार करते है की होन्ग-कोंग में “दुस्त्रजानकारी” का अभियान चाइनीस सरकार के द्वारा ले लिया गया। यह इसलिए भी बहार आया क्यूकी “पहला”, दस्तावेजों और पत्रों के बजाय राज्य के द्वारा प्रायोजित फेस न्यूज़ और जटिल दुस्त्रजानकारी अभियान प्रदर्शनकारियो के खिलाफ चलाया गया। यह इसलिए हुआ क्यूकी चाइना में निष्पक्ष रूप से इस तरह के सोशल प्लेटफार्म का क्षेत्र काफी सीमित है। दूसरा, यह पर भू-राजनितिक तत्व भी मौजूद थे जिसे कभी भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। यहां पर सत्य है है की ये दोनों ही अमेरिका के बने प्लेटफॉर्म्स थे। यह एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ इस तरह के प्लेटफॉर्म को धयान में रखते हुए तैयार किया जाता है। जबकि व्हाट्स-एप्प मैसेज की लोकेशन पता लगाने का विरोध करता है और यह अपने प्लेटफार्म की अखंडता को बनाय रखने की कोशिश करता है। कई सारे भारत में नियम बनाने वाले समझते है को टेक्नोलॉजी इस तरह के समस्या को ठीक कर सकती है और जब ये प्लेटफार्म ठीक प्रकार से काम नहीं करेंगे तब ये शुरू से अंत तक सभी डाटा को एन्क्रिप्ट कर देंगे।

 

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QUESTION-जहाँ तक देखा जाए तो टेक्नोलॉजी कोई समस्या नहीं है बल्कि मैसेज टेक्स्ट का वायरल होना ही समस्या है जो फैक न्यूज़ को जल्दी से जल्दी फैलता है। क्या इस बात पर सहमति जताई जा सकती है की व्हाट्स-एप्प के टेक्स्ट मैसेज कहाँ से आया है उसकी लोकेशन पता चल जाये ?

पूर्ण रूप से वायरेलिटी , एक दूसरे से बात करने की वायरेलिटी हमेशा से ही गुटनबर्ग प्रेस से रही है। जन-संचालन हमेशा से ही एक ऐसे लोग जो शक्तिशाली है और दूसरे जो नहीं है उनके बीच परेशानी बनाते है। और जब हम मैसेज सेवा पर आते है,और जब ये(सोशल मीडिया प्लेटफार्म) भारत में काम करते है और दूसरे उभरते अर्थव्यवथा में,तो उनका उपयोग मैसेज करने के उदेश्य से नहीं होता है। वे हमेशा से ही कई लोगो के लिए एक नई जानकारी का स्रोत रहेगा। वे बार बार वर्ल्ड-वाइड-वेब से सम्बंधित नहीं हो पाते है। जिस तरह के मैसेज लोगो के पास भेजे जाते है वो या तो पिक्चर या फिर विडोयो होती है जो किसी भी वेब से नहीं जुड़ी होती इसीलिए मैसेजिंग एप्प यह करने में सक्षम नहीं होती की वो लोगो को अछिछी और सटीक खबरे उपलब्ध करवा पाए। उद्धरण के लिए- अगर कोई भी मैसेज सर्विस पर साइन-उप करता है जैसे व्हाट्स-अप्प तो यह इस मैसेज एप्प को कैसे पता चलेगा की किसी स्थानीय भाषा में फैक या दुर्भावनापूर्ण मैसेज है और फिर क्या उस पर एक्शन लिया जा सकता है। दुर्भाग्यपूर्णतः ये भी नहीं कहा जा सकता है की मैसेज एप्प में लोग-इन करते वक्त स्थनीय भाषा होती है जो बताई की ये मैसेज नहीं भेजा जा सकता है। और फैक्ट-चेकिंग वेबसाइट,फैक न्यूज़ बस्टर तथा सरकारी स्रोत किसी भी तरह के सपोर्ट नहीं मिल पता है जिससे की वह अपने लिखे कंटेंट को स्थानीय क्षेत्रों में बाट सके इसलिए अब मैसेज सर्विस कंपनी कभी भी आपस में फैक मैसेज के लिए नहीं लड़ती है।
QUESTION-तो अब हम इस बात से सहमत हो सकते है की टेक्नोलॉजी के पास ऐसा अभी लिए कोई हथियार नहीं है जिससे फैक मैसेज को रोक सके और ना ही इसमें किसी भी तरह का दायित्व सोसाइल मीडिया और वेवसाइट के लिए जोड़ सकते है। तो क्या श्रेया सिंघाल जजमेंट इन लाइनों में अकेली खड़ी है ? कुछ प्रावधान मधयस्थ रूप से पढ़ी जा चुकी है पर पिछले साल मिनिस्ट्री ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक्स औरइनफार्मे शन टेक्नोलॉजी ने मध्यस्थो और पब्लिक कमैंट्स के लिए कुछ नए प्रारूप लाये थे.सोशल मीडिया प्लेटफार्म के लिए दायित्व का क्या स्तर होना चाहिए ?
इस स्तर के लिए विवादित कार्यकलाप का बेड़ा है और फिलहाल इसके लिए निष्पक्ष रूप से काफी रेगुलेटरिएस दिशा-निर्देश है। इस तरह के दिशा-निर्देशन सरकार के द्वारा दिए गए है ताकि वे सरकारी एजेंसी को टेक्नोलॉजी कम्पनीयो से भी ऊंचा करने की कोशिश करते रहे बजाय इसके की आज-कल सरकार के बीच यह बाद-विबाद है की डेटा को स्थानीकृत कर दिया जाये। एक बड़ी और मौलिक समस्या यह है की जयादातर बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनी जो की ब्रेड-एंड-बटर वाले व्यवसाय में है वो सभी बहार के देशो में बसे हुए है।कंस्यूमर का विश्वास व्हाट्स-एप्प और फेसबुक,ट्विटर को लेकर निश्चित है। व्हाट्स-एप्प अपने मैसेज को हमेशा एन्क्रिप् करके भेजता है जो की पत्र-व्यवहार के लिए काफी अच्छा है। पर सरकार के पास बहुत छोटी एजेंसी है जो इन कम्पनीज को सरकारी दिशा-निर्देश के पालन करने पर वे कंपनी जो चाहे वो करने दे। फैक्ट यह है की जब हम एक कदम पीछे होकर देखते है तो पता चलता है की सरकार के पास बहुत ही सीमित एजेंसी है जो इन कंपनी के व्यवहार और कार्यो को देख सके। और वही दूसरी जगह भारत में इंटरनेट को अपनाने वालो में बृद्धि हो रही है। और यह तक की व्हाट्स-एप्प का अभी तक इंडिया में कोई ऑफिस भी नहीं है। तथा वही इंटरनेट बंद हो जाता है। यह किसी की भी इच्छा नहीं होगी की इंटरनेट बंद हो जाये। पर अब अगर यही बात स्थानीय नियम कानून सम्भलने एजेंसी और डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट से पूछे तो वे कहेंगे की उनके पास बहुत ही सीमित रस्ते है जिनसे वह फैक कंटेंट को इंटरनेट पर सोशल मीडिया के माध्यम से फैलने से रोके और वो भी संकट से समय जो की या तो प्राकृतिक हो या मानव के द्वारा निर्मित। अतः फैक्ट यह है की स्थानीय स्तर पर सरककर के पास काफी कम और सीमितता होती है जिससे सरकार जो चाहे वो कर सके। अगर इन सभी सोशल मीडिया को देखते है तो ये पता चलता है की इनका निर्माण बोलने की आज़ादी के लिए हुआ था।
QUESTION-आजकल सरकारी एजेंसी के पास पर्यत पर्याप्त एजेंसी नहीं है और अक्सर उनके पास छोटे और हाम-हैंडेड अप्प्रोच होती है जिससे की वः इंटरनेट को निष्प्रभवि बना सके. कुछ केसो में तो बात करने के लिए सोशल मीडिया को पूरी तरह बंद कर दिया जाता है। जैसा की आज-कल कश्मीर में है. इस अप्प्रोच के अलावा किस तरह का क्रिया-विधि होना चाहिए ?
कुछ सालो पहले कानून और नियम संसथान के मदद से कैपेसिटी बिल्डिंग वर्कशॉप हुआ था. जिसमे कुछ राज्यों ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया क्युकी उनके पास अच्छे कारणों की कमी नहीं थी और उनके पास अच्छी पुलिस भी थी। और वे इस काम को करने में काफी इच्छुक भी थे। बजाय इसके की तेलंगाना के एक केडर अफसर जो फैक न्यूस को मिटाने में व्हाट्स-एप्प की मदद लेते है। इन चीज़ो को रोकने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण कदम उठाने पड़ेंगे और शायद काफी सारे राज्य तो अभी तक तैयार भी नहीं है। तो अगर कोई बड़ा अधिकारी डिस्ट्रिक्ट मजिस्टेट को मैसेज भेजता है तो उन्हें इन्ही हम-हैंडेड तकनीक का प्रयोग करना पड़ेगा क्युकी इसके अलावा और कोई रास्ता भी नहीं है। इस बात पर सहमत हुआ जा सकता है की भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश को अपने यूजर का डेटा तो अमेरिका से उपलब्ध होना ही चाहिए। इसी तरह कई बार फेसबुक ने भी यह बात कन्फर्म की है।
THANK YOU…

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