Why RTI Amendment Bill Controversial

भारत जैसे देश जो की एक लोकतांत्रिक देश है जिसमे जनता ही सरकार चुनती है और जनता के द्वारा दिए जाने वाले टैक्स से ही सरकार शासन व्यवस्था एवम प्रशासनिक कार्य करती है परन्तु सरकार के द्वारा किये गए कार्यो की जानकारी जनता कभी भी मांग सकती है तथा उच्च न्यायालय के अनुसार यह भी कहा गया है की जनता को अभिव्यक्ति और सूचना का अधिकार है | भारत के आज़ाद होने के एक लंबे आरसे के बाद भी लोगो के पास सूचना का अधिकार नहीं था | एक लम्बे समय की प्रतीक्षा/प्रदर्शन के बाद 2005 में सूचना का अधिकार अस्तित्व में आया जो की एक संसदीय समिति में पूर्णतः पक्ष एवं विपक्ष पर बहस करके पास हुआ था | इस समिति के मुख्य E. M. Sudarsana Natchiappan थे | एक मजबूत बहस के बाद आये इस क़ानून ने भ्रष्टाचार के खिलाफ काफी प्रभावी हुआ एवं सरकार के द्वारा किये गए कार्यो का ब्यौरा अब लोगो के पास था | परन्तु 2005 में बनाये गए इस एक्ट में हाल ही दिनों में नरेंद्र मोदी प्रसाशन ने कुछ विसंगतियो को दूर करने के लिए इसमें संसोधन लाये है | प्रसाशन का मानना है की 2005 में आये सूचना के अधिकार एक्ट जल्दी जल्दी बना दिए गए थे | हलाकि यह विधियक लोकसभा और राज्यसभा में पास हो गया है | कई सदस्य इस विधियक के पक्ष में नहीं थे और वोटिंग के समय संसद से चले गए | उनका मानना है की संसद में बहुमत के आधार पर रूलिंग पार्टी सभी विधियक बिना किसी बहस के पास करवा लेती है जो की लोकतंत्र का व्यवहार नहीं है |

Why RTI Amendment Bill Controversial
Why RTI Amendment Bill Controversial

परन्तु क्या सूचना के अधिकार एक्ट में संसोधन की जरुरत है ? इस महत्वपूर्ण एक्ट में संसोधन से जनता को फायदा मिलेगा या फिर सरकार अपने कार्यो के प्रति जवाबदेही नहीं होना चाहती ?

संसोधन विधियक में क्या है ?
सरकार ने 2005 के सूचना के अधिकार एक्ट में इसके ढांचे में कुछ बदलाव किये है |
1 . सेक्शन 13
2 . सेक्शन 16

सूचना के अधिकार एक्ट 2005 के अनुसार सेक्शन 13 और 16 क्या है ?

सूचना के अधिकार एक्ट 2005 में सेक्शन 13 (1) के अनुसार “मुख्य सूचना आयुक्त” और “सूचना आयुक्त”के कार्यकाल की अवधि 5 वर्ष या फिर जब तक वह 65 वर्ष का ना हो तब तक वह वह पद से वंचित नहीं हो सकता है |
सेक्शन 13 (5) के अनुसार “मुख्य सूचना आयुक्त” की वही वेतन भत्ता होगा जो “मुख्य निर्वाचन आयुक्त” का होता है | और इसी प्रकार “सूचना आयुक्त” का वेतन “निर्वाचन अधिकारी” के बराबर होगा |

सूचना के अधिकार एक्ट 2005 में सेक्शन 16 के अनुसार “राज्य मुख्य सूचना आयुक्त”और “राज्य सूचना आयुक्त”के कार्यकाल की अवधि 5 वर्ष या फिर जब तक वह 65 वर्ष का ना हो तब तक वह वह पद से वंचित नहीं हो सकता है |और इसी प्रकार “राज्य मुख्य सूचना आयुक्त” का वेतन “निर्वाचन अधिकारी’ के बराबर होगा

सूचना के अधिकार संसोधन विधियक बिल 2019

2 महत्वपूर्ण बदलाव

विधियक में सेक्शन 13 में बदलाव करते हुए कहा गया है की “मुख्य सूचना आयुक्त” और “सूचना आयुक्त’ के कार्यकाल,सेवा एवं वेतन और भत्ता केंद्र सरकार द्वारा दी जाएगी | और इसी प्रकार विधियक में सेक्शन 16 में बदलाव करते हुए कहा गया है की “राज्य मुख्य सूचना आयुक्त” और “राज्य सूचना आयुक्त” के कार्यकाल,सेवा एवं वेतन और भत्ता केंद्र सरकार द्वारा दी जाएगी |
विधीयक में ये भी कहा गया है की “मुख्य सूचना आयुक्त”और “सूचना आयुक्त” के पहले के सरकारी नौकरियों के पेंशन को वर्तमान के नौकरी के वेतन में नहीं काटे जायेगे |

सरकार का मकसद

डॉक्टर जितेंद्र सिंह ने कहा की सूचना के अधिकार एक्ट को संस्थागत सवरूप प्रदान करना ,व्यवस्थित बनाना एवं परिणामोमुखी बनाना है जिससे सूचना के अधिकार एक्ट का ढांचा मजबूत होगा |
प्रशासन का मानना है की इसमें कई विसंगतिया है जिसमे सुधार की जरूरत है |

सरकार का कारण /तर्गसंगतता

प्रशासन ने तर्क दिया की मुख्य सूचना आयुक्त को उच्तम न्यायालय के बराबर का दर्जा दिया गया है लेकिन उसके फेसलो पर उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है | प्रशासन का मानना है की अगर दोनों की वेतन बराबर है तो कैसे एक के फेसलो को निचली अदालत में अपील की जा सकती है |
प्रशासन ने कहा है की मुख्य सूचना आयुक्त का सम्बन्ध एक असंवैधनिक बॉडी से है और मुख्य निर्वाचन आयुक्त का सम्बन्ध संवैधानिक बॉडी से है जो की अनुच्छेद 324 के बेस पर बना है तो यह बात कितनी तर्कसंगत है की मुख्य सूचना आयुक्त और मुख्य निर्वाचन आयुक्त दोनों बराबर है ?
ठीक उसी प्रकार निचली पदों की समस्या है |
दोनों के काम अलग है,दोनों के ढांचे अलग है ,दोनों का सवरूप अलग है तो दोनों एक जैसे कैसे है?

विपक्ष और अपोजिशन के तर्क …
. संसोधन विधियक के विपक्ष ने कहा की इससे सूचना के अधिकार के निष्पक्षता पर सवाल उठता है |
अगर मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त की वेतन भत्ता ,कार्यकाल और सेवाएं केंद्र सरकार के पास आ जाएगी तो सरकार के खिलाफ कोई डाटा नहीं उपलब्ध हो पायेगा | यह एक्ट फिर जानता के प्रति नहीं बल्कि सरकार के प्रति और सरकार के लिए काम करने वाली हो जाएगी

सूचना के अधिकार के प्रशासन में काम करने वाले लोग सरकारी नौकर की तरह बर्ताव करेंगे और सरकार ही तय करेगी की क्या करना है और क्या नहीं |

विधेयक के पास हो जाने पर मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त केंद्र को खुश करने में लग जायेगे ताकि उनकी नौकरी और वेतन में कई कमी ना आये और पुराने नौकरीओ के पेंशन भी आती रहे |
विधेयक के जरिये सूचना के अधिकार के स्वतंत्र और स्वायत्ता समाप्त हो जाएगी |

Why RTI Amendment Bill Controversial
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अगर कोई भी सरकार बहुमत से आये तो यह नहीं की वह अपने फायदे के अनुसार क़ानून बनती जाए और संसदीय समिति में बिना बहस किये विधेयक पास करवाती जाए बल्कि किसी भी मुद्दे पर बहस जरुरी है | यह बहस ही बहुत सारे दृश्टिकोण खोलता है और मुद्दे के पक्ष के साथ साथ कई विपक्ष तर्क भी सामने आते है और इसी प्रकार सूचना का अधिकार एक्ट सामने आया था |
EXAMPLE…
15वी लोकसभा में 71 % विधेयक को संसदीय समिति के पास भेजा गया अतः पूर्ण रूप से विधेयक पर बहस हुई परन्तु 16वी लोकसभा में 26 % विधेयक को संसदीय समिति में भेजा गया और जिसमे पूर्ण रूप से तर्क वितर्क नहीं हुए और अब 17वी लोकसभा में 11 विधेयक में से 1 भी बिल संसदीय समिति में
बिना बहस के पास होते जा रहे है |

भारत में सूचना के अधिकार का इतिहास

अंग्रेजो के भारत में शासन करने के साल बाद भी शासकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 कानून भारत में लागू हुआ। इस कानून के तहत यह बताया गया था की सरकार को किस भी सूचना लो गोनपनीय रखने का पूर्ण अधिकार है । और वे जनता के प्रति जवाबदेही नही होगी।देश को अंग्रेजो से 1947 में आज़ादी मिलने के के साल बाद भी संविधान में सूचना के अधिकार की कोई चर्चा नही हुई । और न ही शासकीय गोनपनीय अधिनियम में कोई संशोधन किया गया। इसके चलते सरकार धारा 5 और धारा 6 का लाभ उठाकर जनता से सूचना छुपाती रही।

भारत में पहली बार सूचना के अधिकार के प्रति सजगता/ध्यान वर्ष 1975 के उत्तर प्रदेश बनाम राज नारायण केस से पड़ी। इस मामले में उच्च न्यायालय में दलील दी की लोक प्राधिकारियों द्वारा सार्वजनिक कार्यो का ब्यौरा जनता हो देना आवश्यक है। इस दलील ने संविधान में वर्णित 19(अ) के दायरे को बढ़ाकर उसमे सूचना के अधिकार को भी शामिल कोय गया।

1982 में दूसरे प्रेस असयोग ने शासकीय गोपनीयता कानून 1923 की धारा 5 की सम्पति पर सिफारिश की। आयोग ने धारा 5 को इसलिए समाप्ति की ओर बढ़ाया क्योंकि उनका मनना था की इस धारा में यह कही भी परिभाषा नही है की गुप्त और शासकीय क्या है।

इसके बाद दूसरे प्रशासनिक आयोग ने इस कानून को निरस्त करने की सिफ़ारिश भी की।
1990 के शुरुआती सालो में मजदूर किसान शक्ति संगठन ने लोगो की हक की लड़ाई लड़ते हुए सूचना के अधिकार को एक नए सिरे से परिभाषित किया ।

एम.के.एस.एस के अनुसार भ्रष्टाचार समाप्ति के लिए जनसुनवाई कार्यक्रम लाना आवश्यक है।
सरकारी खर्च का सोशल ऑडिट करवाना
सरकारी खर्च को जनता के सामने रखा जाये
जिन लोगो को वाजिव हक़ नहीं मिला उन्हें सुनवाई का मौका मिले |

1989 की तत्कालीन सरकार ने घोषणा की,की सविधान में संसोधन के द्वारा सूचना का अधिकार बनने एवं शसकीय गोपनीयता अधिनियम में संसोधन किया जायेगा लेकिन कई कोशिशों के बाबजूद इसे लागू नहीं किया गया |

सरकार ने 1997 में एच डी शौरी कमेटी का गठन किया | समिति ने सूचना की स्वतंत्रा का प्रारूप प्रस्तुत किया लेकिन इस कमेटी पर कोई काम नहीं हुआ |
1997 में मुक्यमंत्रियो द्वारा संकल्प लिया गया की केंद्र और राज्यों में पारदर्शिता के लिए सूचना का अधिकार लागू करे | इस दिशा में पहला कदम उठाने वाला राज्य तमिलनाडु था जिसने 1997 में आर टी आई प्रारूप पास किया |

साल 2002 में सूचना का स्वतंत्रा विधियक पास हुआ और जनवरी 2003 में राष्ट्रपति ने अपनी मंजूरी दे दी| और फिर समाज में जवावदेही और पारदर्शिता के लिए 2005 में सूचना का अधिकार पारित हुआ | आज विश्व में 80 से जयादा देशो में यह कानून लागु हुआ |

निष्कर्ष:

इस बात में कोई दोराय नहीं है की सरकार अब सभी इंस्टीटूशन को अपने हिसाब से चलना चाह रही है परन्तु इससे जनता का कोई फायदा नहीं हो पा रहा है| और अगर सरकार ऐसे काम करते रहेगी तो आगे आने वाले चुनाव उनके लिए जयादा फायदेमंद नहीं रहेंगे | सूचना का अधिकार कानून में कोई बदलाव की जरुरत नहीं थी यह पहले से ही जनता हो पारदर्शिता प्रदान कर रहा था और सभी विभागों के किये गए कामो का ब्यूरा भी दे रहा था | अब इस क़ानून में बदलाव ने जनता का प्रति जवावदेही और पारदर्शिता को खो दिया है |

THANK YOU…

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